प्रमुख ऐतिहासिक स्थल - UPSC,PSC,UGCNET,SSC,
Print Friendly and PDF

प्रमुख ऐतिहासिक स्थल



HISTORY,IAS SSC,BSSC,JPSC,JSCC




बौद्धगया :-- बिहार में गया से 10 Km दूर निरंजना नदी के तट पर अवस्थित बौद्धकालीन स्थल। बौद्धगया में ही महात्मा बुद्ध ने पीपल वृक्ष के निचे ज्ञान प्राप्त किया और बुद्ध कहलाये। बौद्धगया में  अशोक ने एक बौद्ध विहार का निर्माण करवाया था। सातवीं सदी में गौंड नरेश शशांक ने  बौद्धगया को नष्ट करने का प्रयास किया और बोद्धिवृक्ष कटवा कर जला दिया।
पाटलिपुत्र :-- बिहार प्रान्त से सोन और गंगा नदी के संगम पर स्थित है। पाटलिपुत्र में दुर्ग का निर्माण हर्यंक वंश के राजा अजातशत्रु ने ई० पू ० पांचवी सदी में करवाया। पाटलिपुत्र नन्द वंश ,मौर्यवंश ,कण्व वंश और शुंगवंश की राजधानी रहा। पाटलिपुत्र को कुसुमपुर भी कहा जाता था। पाटलिपुत्र कुम्हरार के उत्तर में विस्तृत था। अशोक ने यहां पंच पहाड़ियों का निर्माण करवाया था। गुरु गोविन्द सिंह का जन्म यहीं हुआ था आज उनकी जन्म स्थली पर विशाल गुरुद्वारा निर्मित है।  
बुर्जहोम :-- श्रीनगर से 16 Km दूर उत्तर-पश्चिम में अवस्थित नवपाषाण युगीन संस्कृति का केंद्र। बुर्जहोम का शाब्दिक अर्थ है -- " जन्म का स्थान " . यहाँ पर लोग गड्ढे बनाकर रहते थे जो कृषि और शिकार पर निर्भर थे। बुर्जहोम के लोग Coarse Grey Pottery इस्तेमाल करते थे। कब्रो में कुत्ते की हड्डी मिली है। बुर्जहोम में सभ्यता 2400 ई ० पू ० अस्तित्व में थी। 
 प्राग्ज्योतिषपुर:-- भारत के उत्तर-पूर्व में अवस्थित असम की प्राचीन राजधानी। वर्तमान में  प्राग्ज्योतिषपुर की पहचान गोहाटी नगर से की जाती है। हेमचन्द्र ने अभिधान चिंतामणि में प्राग्ज्योतिषपुर का दूसरा नाम कामख्या बताया है। अफसगढ़ अभिलेख में कामरूप नरेश सुस्थित्वर्मा का उल्लेख है। प्राग्ज्योतिषपुर कामख्या देवी के मंदिर के लिए विख्यात है।
भगवानपुरा:-- हरियाणा में अवस्थित उत्तर-हड़प्पा कालीन नगर है। भगवानपुरा से प्राप्त सभ्यता का समय 1600 ई० पू ० से 1000 ई० पू ० के बीच माना जाता है। Painted Grey Ware मिले है। भगवानपुरा से 13 कमरो का मिट्टी का बना घर मिला है। जानवरो की हड्डियाँ भारी मात्रा में मिली है।
पलिताना:-- गुजरात में गिरनार पर्वत के समीप शत्रुंजय पर्वत पर अवस्थित। सबसे बड़ा जैन मंदिर एंव जैन तीर्थ के रूप में विख्यात। ऋषभदेव या आदिनाथ को समर्पित इस मंदिर का निर्माण 960 ई० में हुआ था। अन्य मंदिरो में प्रमुख है -- चौमुख ,कुमारपाल ,सम्प्रति और विमल मंदिर। चौमुख मंदिर विशेष जैन स्टाइल में बना हुआ है। 
पिपरहवा :-- उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में अवस्थित बुद्धकालीन स्थल। महात्मा बुद्ध के भस्मावशेष स्मारक के रूप में स्थापित। पिपरहवा कपिलवस्तु गणराज्य की राज्यधानी थी।
 पुरुषपुर :-- पाकिस्तान के उत्तरी -पश्चिमी सीमांत प्रान्त में अवस्थित। वर्तमान में पुरुषपुर को पेशावर के नाम से जाना जाता है। दूसरी सदी में कुषाण सम्राट कनिष्क द्वारा इसे बसाया गया और अपनी राजधानी बनाया। यहाँ कनिष्क ने एक स्तम्भ का भी निर्माण करवाया। कला की गंधार शैली का प्रमुख केंद्र था।
   बैराठ :- इस स्थलको विराट नाम से भी जाना जाता था। महाजनपद काल में मत्स्य महाजनपद की राजधानी थी और आधुनिक जयपुर के समीप अवस्थित  थी। महाभारतकाल में पांडवो ने विराट नरेश के यहाँ ही अपना अज्ञातवास पूरा किया था। बैराठ से मिले अशोक के अभिलेख और मौर्यकाल में निर्मित ईंटो का मंदिर मिला है  बैराठ की ऐतिहासिकता बताते है। दूसरी सदी ई ० पू ० बौद्ध विहार है।
 भारकच्छ:- भारकच्छ की पहचान आधुनिक भड़ौच से की जाती है। कठियावाडा में समुद्र तट पर अवस्थित यह प्रमुख तटवर्ती नगर और व्यापारिक केंद्र था। यहाँ से विभिन्न स्थानों के लिए व्यापारिक मार्ग जाते थे। "पेरिप्लस ऑफ़ इरिथ्रियन सी "में इसे बेरीगाजा कहा है।
मदुरई :- तमिलनाडु में अवस्थित धार्मिक नगरी। इसे दक्षिण का मथुरा भी कहा जाता है। यह पाण्ड्य राजवंश की राजधानी थी। यह चारदीवारी से घिरा हुआ नगर था जिसके चार दरवाजे थे। दीवार के चारो तरफ गहरी खाई थी। शिलप्पादिगरम के अनुसार मुख्य सड़क पर शाही बाजार और वैश्याएं होती थी और सुनार,अनाज व्यापारी ,कपडा व्यापारियों के लिए अलग सड़के होती थी। शिव को समर्पित वेलियांबलम का मंदिर है। मीनाक्षी देवी का मंदिर है।
 नासिक:- महाराष्ट्र में मुंम्बई से 185Km दूर गोदावरी के तट पर अवस्थित ताम्रपाषाणयुगीन नगर। नासिक ताम्रपाषाणयुगीन संस्कृति से आधुनिक संस्कृति तक लगभग सभी संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करता है। गौतमीपुत्र शातकर्णी के अवशेष से ज्ञात होता है की नासिक सातवाहनों का शासन रहा था। इसे दूसरी वाराणसी भी कहा जाता है। उन चार स्थानों में एक जहाँ कुम्भ का मेला आयोजित होता है। ऐसा कहा  जाता है की यहाँ लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काट ली थी। इसलिए इस स्थान का नाम नासिक पड़ा।
नालन्दा :- सातवीं शताब्दी का भारत का सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्धालय एंव बौद्ध शिक्षा केंद्र। दक्षिण बिहार में राजगृह के समीप इस ध्वंसावशेष बड़गाँव नामक ग्राम में दूर -दूर तक बिखरे पड़े है। गुप्त सम्राट नरसिंहगुप्त बालादित्य ने 470 ई ० में एक सुंदर मंदिर का निर्माण करवाया था। जिसमे 80 फुट ऊँची बुद्ध की मूर्ति है। नालन्दा विश्वविद्धालय कम से कम एक मील लम्बा और आधा मील चौड़ा है। विश्वविद्धालय की आपूर्ति दान में दिए गए 200 गाँवो से होती थी। कुलपति की सहायता के लिए दो परिषदें होती थी ,एक शिक्षा से सम्बंधित दूसरी प्रशासन से। इत्सिग ने विश्वविद्धालय में छात्रों की संख्या 3000 बताई है जबकि हवीली ने 1000, यह महायान साहित्य का प्रमुख केंद्र था। यहाँ से शिक्षा प्राप्त करने वाले धर्माचार्य थे धर्मपाल,चन्द्रपाल,गुणमति,स्थिर-मित,प्रज्ञामित्र,जिन-मित्र,ज्ञानचन्द्र,और शीलभद्र। बारहवीं शताब्दी में मुस्लिम आक्रमणों के फलस्वरूप यह विश्वविद्धालय नष्ट हो गया।
नाचना :- विन्ध्य क्षेत्र में अवस्थित पवित्र स्थल। पाँचवी  सदी में यहाँ  पार्वती मंदिर का निर्माण हुआ। यहाँ से कुछ दुरी पर स्थित भूमरा नामक स्थान पर पाँचवी सदी के उत्तरार्द्ध में निर्मित शिव मंदिर है। गुप्तकालीन वास्तुकला के केंद्र के रूप में जाना जाता है। भूमरा के मंदिर से शिव गणों की अनेक दर्शनीय मूर्ति मिली है।

नागार्जुनीकोंडा :- आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में कृष्णा नदी की घाटी में अवस्थित है। प्रथम शताब्दी में यहाँ सातवाहनों का शासन था। बौद्ध धर्म के महायान सम्प्रदाय का प्रमुख केंद्र रहा।नागार्जुनीकोंडा को शंकराचार्य ने प्रचार का मुख्य केंद्र बनाया। नागर्जुनी की पहाड़ियों में गोपी गुहा सर्वाधिक बड़ी है। इसका निर्माण मौर्य सम्राट दशरथ ने करवाया। नागार्जुनीकोंडा से स्तूप,चैत्य,विहार और रेलिंग मिले है। नागार्जुनीकोंडा से प्राक्  मौर्यकालीन व्यापारिक गतिविधियों के प्रमाण मिले है।
नवदाटोली :- नर्मदा के दक्षिण में मध्य प्रदेश में अवस्थित ताम्रपाषणयुगीन स्थल। ताम्रपाषण युग में नवदाटोली के  लोग बेर और अलसी पैदा करते थे। 400 ई० पू ० में नवदाटोली पुनः आबाद हुआ। नवदाटोली के स्तूप की कुछ ईंटो से तृतीय शताब्दी ई० पू ० के अभिलेख मिले है। यहाँ से प्राप्त पुरातत्व सामग्री में सिक्के,छल्लेदार कुँए,लाल - काले और उत्तरी काले पालिश युक्त मृदभांड शामिल है।
     



No comments:

Post a Comment